नीरज कुमार

नीरज कुमार

मधेपुरा जिला के नगर परिषद् क्षेत्र में वार्ड संख्या – 3 में श्री अशोक कुमार का परिवार आर्थिक तंगी से जूझता हुआ था I श्री अशोक अपने परिवार का भरण पोषण दिनभर ठेला पर शहर की गली में फल बेच कर करता था। उनका  13 वर्षीय पुत्र एवम् 11 वर्षीय छोटा भाई दीपक बचपन से न सुन पाता था, न ही बोल पाता था । दीपक आवाज सुनता था लेकिन बड़े भाई के साथ हमेशा रहने के कारण वह भी नीरज की भांति बोलता नहीं था तथा उसी की भांति संकेतों में इज़हार करता था । पिता तो समझ सकते थे लेकिन दुनिया को समझाने के लिए संकेत की भाषा नाकाफी है । वे लोग प्रदेश के कई डॉक्टर एवं विशेषज्ञों से मिले। विशेष स्कूल एवं सुनाने वाली कान की मशीन (श्रवण यन्त्र) की खरीदारी करना इस परिवार के लिए मुश्किल था । तब उनके घर के नजदीक लाल मध्य विद्यालय में नीरज एवं उसके छोटे भाई ने संसाधन शिक्षकों की मदद ली ।

बिहार शिक्षा परियोजना, मधेपुरा अन्तर्गत समावेशी शिक्षा में कार्यरत संशाधन शिक्षक ने नीरज एवं दीपक का हौसला बढाया । बिहार शिक्षा परियोजना द्वारा संचालित डे केयर सेंटर में संसाधन शिक्षक की मदद से दोनों भाई नामांकन हुआ । मधेपुरा में कार्यरत पुनर्वास विशेषज्ञ द्वारा दोनों भाइयो को जाँच कराया गया । नीरज को लाल म. वि. में डे केयर सेंटर में जाँच किया गया जिसमें पाया गया कि नीरज का  B/L Severe Sensory Neural Hearing Loss था जिसके कारण वह किसी भी प्रकार का आवाज नहीं सुन सकता था ।

डे केयर सेंटर में उसे निःशुल्क श्रवण यन्त्र उपलब्ध कराया गया ।  माता पिता को घर पर अपने साथ अधिक-से-अधिक समय तक वार्ता करने हेतु परामर्श दिया गया । दोनों भाई को डे केयर सेंटर पर रोज स्पीचथेरापी प्रदान किया गया। नीरज श्रवण यन्त्र की सहायता से आवाज पहचानने लगा, अपनी भावनायें को प्रगट करना, किताबों का चित्र देखना, खो-खो, बैडमिंटन आदि जैसे खेल में भी जोर-शोर से भाग लेना । संसाधान शिक्षकों भी नीरज को देखकर काफी खुश थे लेकिन किताबी ज्ञान की अभी भी समस्या बनी हुई थी । शिक्षक एवं पुनर्वास विषेशज्ञों से लगातार संपर्क बनाये रखे । धीरे धीरे नीरज को भी शैक्षणिक विकास होने लगा । 10 माह में 20 तक का पहाड़ा, 100 तक की गिनती, जोड़, घटाव, भाग आदि सिख लिया । विद्यालय के सामान्य बच्चों के तरह विद्यालय में खेल-कूद, चित्रांकन आदि में हिस्सा लेने लगे। दोनों भाई खेलने एवं कूदने जैसे अन्य क्रियाकलापों में भाग लेने लगे । गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, विश्व विकलांगता दिवस एवं अन्य आयोजित कार्यकर्मों गणित दौड़, सैकरेस दौड़, चित्रांकन आदि में जिला स्तर पर अपना स्थान बना लिया । उनके माता पिता को यह बदलाव, विश्वास एवं सफलता देखकर होठों पर मुस्कान रहती है ।